भाग 1: पैसों का खेल और शर्मनाक मांग
मेरा नाम मुकेश है। मैं एक साधारण सा आदमी हूं, लेकिन मेरी किस्मत ने मुझे एक ऐसी दौलत दी जिसका इस्तेमाल मैंने कभी नहीं सोचा था। यह कहानी शुरू होती है उस दिन से जब मेरी पड़ोसन सिमरन मेरे दरवाजे पर खड़ी थी। पैसा उड़ाके फसी भाभी बनी राखेल
सिमरन, 32 साल की एक खूबसूरत औरत, जिसका पति अक्सर बिजनेस ट्रिप पर रहता था। उसकी आंखों में वो चमक थी जो हर शादीशुदा औरत की आंखों में होती है जो अपने पति से दूर रहती है। लेकिन उसकी इस चमक के पीछे एक गहरा राज था – वो पैसों की आयाशी में उड़ा चुकी थी अपने पति की कमाई का एक बड़ा हिस्सा।
वो दिन था जब उसके पति ने उसे पैसे देने से मना कर दिया था। उसकी क्रेडिट कार्ड की लिमिट खत्म हो चुकी थी। उसके पास कोई रास्ता नहीं बचा था। और वो मेरे घर आई थी, आंखों में आंसू, होंठों पर शर्मिंदगी, और दिल में एक गहरी उम्मीद।
“मुकेश जी… प्लीज़… मुझे मदद चाहिए,” उसने कहा, अपने हाथों को जोड़ते हुए।
मैंने उसे अंदर बुलाया। वो सोफे पर बैठी, उसकी साड़ी का पल्लू कंधे से सरक रहा था। उसकी गर्दन पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं। गर्मी का दिन था, और उसके कपड़े उसके शरीर से चिपके हुए थे, उसके आकार को साफ दिखा रहे थे।
“क्या हुआ सिमरन? इतनी परेशान क्यों हो?” मैंने पूछा।
“मुकेश जी… मैं… मैंने कुछ गलत कर दिया,” उसने रोते हुए कहा। “मैंने अपने पति के पैसे… उनके बिना बताए… कुछ शॉपिंग कर ली। कुछ पार्टियों में उड़ा दिए। और अब… अब वो पता चल गया है। उन्होंने मुझे घर से निकालने की धमकी दी है।”
मैंने उसे घूरते हुए देखा। उसकी ये हालत देखकर मेरे अंदर कुछ जाग उठा। एक शिकारी का इंस्टिंक्ट। मुझे पता था कि ये मेरा मौका है।
“तुम्हें कितने पैसे चाहिए?” मैंने पूछा।
“50,000… बस इतने से ही मेरा काम हो जाएगा,” उसने कहा, आंखें झुकाए हुए।
मैंने उसकी ठोड़ी को उठाया, उसकी आंखों में देखा। “और इसके बदले में तुम मुझे क्या दोगी?”
वो समझ गई। उसकी आंखों में एक डर और शर्मिंदगी का मिश्रण था, लेकिन साथ ही एक मजबूरी भी। वो जानती थी कि वो कहां फंसी है।
“मुकेश जी… प्लीज़… मैं… मैं कुछ भी करने को तैयार हूं,” उसने धीरे से कहा, उसकी आवाज़ कांप रही थी।
मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “तो फिर आज से तुम मेरी रखेल बनोगी। जब भी मैं चाहूं, जहां भी मैं चाहूं, तुम मुझे दोगी। समझी?”
उसने धीरे से सिर हिलाया। उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे, लेकिन उसके होंठों पर एक मजबूरी की मुस्कान थी।
भाग 2: पहली रात – शर्मिंदगी और पहला स्पर्श
वो रात थी जब सब कुछ बदल गया। सिमरन ने अपने पति को बोला कि वो अपनी सहेली स्वाति के यहां रुक रही है। लेकिन असल में वो मेरे घर आई थी।
मेरा घर एक इमारत की टॉप फ्लोर पर था, और उसके ऊपर एक बड़ी टेरेस थी जहां से पूरे शहर का नज़ारा दिखता था। रात के 11 बजे थे। सिमरन ने एक सफेद रंग की साड़ी पहनी थी जो उसके गोरे शरीर पर बेहद खूबसूरत लग रही थी।
“आओ,” मैंने उसे टेरेस पर ले जाया।
रात की खामोशी थी। हवा में एक ठंडक थी, लेकिन सिमरन के शरीर पर पसीना था। नर्वसनेस। डर। अनजान उत्सुकता।
मैंने उसे अपनी बाहों में भर लिया। उसका शरीर कांप रहा था। मैंने अपने होंठ उसके कान के पास ले गया और धीरे से कहा, “डरो मत… आज से तुम मेरी हो… और मैं तुम्हें वो सुख दूंगा जो तुम्हारे पति कभी नहीं दे सकते।”
मैंने उसके गालों पर अपने होंठ रखे। एक हल्का, शर्मीला चुंबन। फिर दूसरा। उसकी सांसें तेज हो गईं। मैंने उसके चेहरे को अपने हाथों में पकड़ा और उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए।
वो पहला किस… वो लंबा, जुनूनी किस जिसमें दोनों ने एक-दूसरे को खोया। उसके होंठ नरम थे, मीठे थे, और थोड़े कांपते हुए। मैंने अपनी जीभ से उसके होंठों को चाटा, उन्हें गीला किया, फिर धीरे से उसके मुंह में अपनी जीभ घुसा दी।
“उम्म्म…,” एक हल्की सी आवाज़ निकली उसके मुंह से।
मैंने उसे कसकर पकड़ लिया। मेरे हाथ उसकी पीठ पर घूम रहे थे, फिर धीरे से नीचे आ रहे थे। उसकी साड़ी का पल्लू मैंने खींचा और उसे गिरा दिया। उसकी गर्दन खुल गई, उसका ब्लाउज उसके स्तनों को कसे हुए था।
मैंने उसके गर्दन पर किस करना शुरू किया। गर्दन के एक तरफ से दूसरी तरफ, फिर नीचे की ओर। उसकी सांसें और तेज हो गईं। “आह्ह्ह…,” वो फुसफुसाई।
मैंने उसके ब्लाउज के बटन खोलने शुरू किए। एक-एक करके। उसका ब्लाउज खुल गया, अंदर एक काले रंग की ब्रा थी जो उसके उभरे हुए स्तनों को संभाले हुए थी।
“क्या खूबसूरत चीज़ हो तुम,” मैंने उसकी आंखों में देखते हुए कहा।
मैंने उसकी ब्रा के ऊपर से ही उसके स्तनों को दबाना शुरू किया। वो मेरे हाथों में अपने आप को दबाती हुई नज़र आ रही थी। मैंने उसकी ब्रा को ऊपर खींचा, उसके स्तन आज़ाद हो गए। गोल, गुलाबी निपल्स वाले, कसे हुए स्तन।
मैंने एक स्तन को अपने हाथ में लिया और उसके निपल को अपने मुंह में ले लिया। चूसना शुरू किया, काटना शुरू किया।
“उफ्फ्फ… आह्ह्ह… हाय्य्य…,” सिमरन चीखी, अपने हाथों से मेरे सिर को अपने स्तनों पर दबाते हुए।
मैंने दूसरे स्तन को भी वैसे ही चूसा, चाटा, दबाया। उसका शरीर अब कांप रहा था, लेकिन अब ये कामुकता की कंपकंपी थी। वो मेरे हाथों में निढाल होती जा रही थी।
मैंने उसकी साड़ी को खोलना शुरू किया। पहले पेटीकोट का नाड़ा, फिर उसे नीचे खींचा। वो अब केवल अपनी पैंटी में थी, उसका ब्लाउज और ब्रा खुले हुए थे।
“ये क्या है?” मैंने उसकी पैंटी के ऊपर से उसकी चूत को सहलाते हुए पूछा।
“प्लीज़… मुकेश… धीरे…,” वो कांपते हुए बोली।
मैंने उसकी पैंटी को एक तरफ खींचा। उसकी चूत साफ शेव्ड थी, गुलाबी, गीली होती जा रही थी। मैंने अपनी एक उंगली उसकी चूत पर रखी और धीरे से अंदर घुसा दी।
“ओह्ह्ह माय्य्य गॉड्ड्ड…,” सिमरन चिल्लाई, अपने पैरों को कसते हुए।
मैंने उसकी चूत में उंगली अंदर-बाहर करनी शुरू की। वो पागल हो रही थी। उसके मुंह से आवाजें निकल रही थीं – “आह्ह्ह… उम्म्म… हाय्य्य… फास्स्ट्ट्टर…”
मैंने उसे फर्श पर लिटा दिया। टेरेस का ठंडा फर्श, गर्म शरीर, और एक जुनूनी चुदाई का माहौल। मैंने अपने कपड़े उतारे, मेरा लंड पूरी तरह खड़ा था, 7 इंच लंबा, मोटा, और कसकर हुआ।
मैंने उसके पैरों को फैलाया, उसकी चूत को अपने हाथों से चौड़ा किया, और अपने लंड का सुपारा उसके मुँह पर रख दिया।
“तैयार हो?” मैंने पूछा।
“हां… पर धीरे से… प्लीज़…,” उसने कहा, आंखें बंद करते हुए।
मैंने एक जोरदार धक्का लगाया। मेरा लंड उसकी चूत में पूरा का पूरा समा गया।
“उउउउउह्ह्ह्ह्ह… आह्ह्ह्ह्ह… हाय्य्य्य्य राम्म्म…,” सिमरन की चीख टेरेस पर गूंजी।
मैंने उसके मुंह पर अपना हाथ रख दिया। “चुप! कोई सुन लेगा।”
वो अपने दांतों से अपने होंठ काट रही थी, आंखों से आंसू बह रहे थे, लेकिन उसके शरीर ने मेरा साथ देना शुरू कर दिया था। मैंने धक्के लगाने शुरू किए। धीरे-धीरे, फिर तेज़-तेज़।
“घप… घप… घप…,” आवाज़ें आ रही थीं।
“कैसा लग रहा है मेरी रखेल?” मैंने उससे पूछा, उसकी चूत में अपना लंड पेलते हुए।
“अह्ह्ह… बहुत अच्छा… उफ्फ्फ… और तेज़… प्लीज़… और तेज़…,” वो बोली, अब पूरी तरह मस्ती में।
मैंने उसके पैरों को अपने कंधों पर रखा और और गहरे धक्के लगाने शुरू किए। उसकी चूत मेरी लंड को कस रही थी, चूस रही थी। वो एकदम गीली हो चुकी थी, उसकी चूत से रस बह रहा था।
“आह्ह्ह… उम्म्म… हाय्य्य… मुकेश… मैं… मैं झड़ने वाली हूं…,” वो चिल्लाई।
“रुक जा… अभी नहीं…,” मैंने कहा, अपनी स्पीड और बढ़ा दी।
मैंने उसे घोड़ी बनने को कहा। वो उठी, अपने हाथों से फर्श पर सहारा लिया, और मैंने उसके पीछे से उसकी चूत में अपना लंड घुसा दिया।
“घप… घप… घप…,” और तेज़, और गहरा।
“उह्ह्ह… आह्ह्ह… ओह्ह्ह… माय्य्य गॉड्ड्ड…,” सिमरन की आवाज़ें टेरेस पर गूंज रही थीं।
मैंने उसकी गांड को थप्पड़ मारे, उसके बालों को पकड़ा और उसे पीछे की ओर खींचा। “कौन है तू?”
“मैं… मैं तेरी रखेल हूं…,” वो कहती हुई, सिसक रही थी।
“क्या चाहिए तुझे?”
“तुम्हारा लंड… मेरी चूत में… प्लीज़… और तेज़…,” वो पागल होकर बोली।
मैंने और जोर-जोर से धक्के लगाए। 15-20 मिनट की जोरदार चुदाई के बाद, मैंने महसूस किया कि मैं झड़ने वाला हूं। मैंने अपना लंड बाहर निकाला, उसे घुमाया, और उसके मुंह के पास ले आया।
“चूसो… अपनी मालिक का लंड चूसो…,” मैंने कहा।
उसने अपने मुंह में मेरा लंड ले लिया और चूसना शुरू कर दिया। कुछ ही पलों में मैंने अपना सारा माल उसके मुंह में छोड़ दिया। वो सब पी गई, एक भी बूंद बर्बाद नहीं होने दी।
वो फर्श पर गिर गई, सांसें फूंकती हुई, पसीने से लथपथ, लेकिन चेहरे पर एक संतुष्टि की मुस्कान थी।
भाग 3: स्वाति की मांग और नई शिकारी
कुछ हफ्ते बीत गए। सिमरन अब मेरी नियमित रखेल बन चुकी थी। वो हर उस रात मेरे पास आती थी जब उसका पति घर पर नहीं होता था। लेकिन मैं एक दिन औरतों की लालची नज़रों से देख रहा था – उसकी सहेली स्वाति को।
स्वाति, 28 साल की, अविवाहित, एक जिम ट्रेनर। उसका शरीर एकदम फिट था, कसी हुई जांघें, उभरी हुई छाती, और एक गोरी त्वचा जो धूप में भी चमकती थी। मैंने सिमरन से कहा, “मुझे स्वाति भी चाहिए।”
सिमरन ने पहले तो मना किया, लेकिन जब मैंने उसे याद दिलाया कि वो मेरी रखेल है और उसे मेरी हर बात माननी होगी, तो उसने मान लिया।
अगली रात, सिमरन ने स्वाति को मेरे घर बुलाया। एक बहाने से – कि वो उसे एक नए जिम के बारे में बताना चाहती है।
जब स्वाति आई, तो उसने एक टाइट फिटिंग की टी-शर्ट और शॉर्ट्स पहने थे। उसके पैर लंबे थे, उसकी जांघें मांसल थीं, और उसकी छाती… ओह्ह्ह… वो तो एकदम ताज़ा मलाई की तरह लग रही थी।
“स्वाति, ये मुकेश हैं… मेरे… अच्छे दोस्त,” सिमरन ने परिचय कराया।
स्वाति ने मुस्कुराते हुए हाथ मिलाया। उसकी हाथ की गर्मी मुझे उसके शरीर की गर्मी का अहसास दिला रही थी।
रात का खाना हम तीनों ने साथ में किया। वाइन थी, म्यूजिक था, और एक अजीब सा तनाव था हवा में। सिमरन ने धीरे-धीरे स्वाति को मेरे करीब लाने की कोशिश की। उसने बताया कि मैं कितना अच्छा हूं, कितना केयरिंग हूं, और कितना… मर्दाना हूं।
वाइन के नशे में स्वाति ढीली पड़ने लगी। उसकी आंखें मुझे घूर रही थीं, मेरे शरीर को स्कैन कर रही थीं। मैंने उसके पैर के पास अपना पैर रखा, उसकी जांघ को हल्के से छुआ।
उसने कुछ नहीं कहा। बस मुस्कुराई।
रात के 1 बजे थे। सिमरन ने कहा, “चलो, टेरेस पर चलते हैं… हवा खा लेते हैं।”
टेरेस पर, रात की खामोशी में, हम तीनों अकेले थे। सिमरन ने स्वाति को मेरे पास बिठाया और खुद हमारे सामने खड़ी हो गई।
“स्वाति… मुकेश को तुम बहुत पसंद आई हो,” सिमरन ने कहा।
स्वाति ने शर्माते हुए सिर झुकाया। मैंने उसका चेहरा उठाया और उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए।
वो पहला किस… वो लंबा, जुनूनी किस जिसमें स्वाति ने भी अपनी जीभ मेरे मुंह में डाल दी। उसकी जीभ मजबूत थी, उसके होंठ मोटे थे, और उसकी सांसें तेज़ होती जा रही थीं।
सिमरन ने हमारे कपड़े उतारने शुरू किए। पहले स्वाति की टी-शर्ट, फिर उसकी शॉर्ट्स। उसके अंदर एक काले रंग की स्पोर्ट्स ब्रा और मैचिंग पैंटी थी।
“वाह… क्या बॉडी है,” मैंने कहा, स्वाति के कसे हुए पेट को सहलाते हुए।
मैंने उसे खड़ा किया और उसकी ब्रा खोल दी। उसके स्तन एकदम टाइट थे, गोल, गुलाबी निपल्स वाले, जैसे किसी 18 साल की लड़की के। मैंने उन्हें अपने हाथों में लिया, दबाया, चूसा, काटा।
“आह्ह्ह… उम्म्म…,” स्वाति की आवाज़ें निकल रही थीं।
सिमरन ने मेरे कपड़े उतारे। मेरा लंड देखकर स्वाति की आंखें चौड़ी हो गईं। “इतना बड़ा…,” उसने धीरे से कहा।
“चूसो…,” मैंने उसके सिर को अपने लंड की तरफ धकेल दिया।
उसने अपने मुंह में मेरा लंड लिया और चूसना शुरू कर दिया। वो एक्सपर्ट थी, उसने अपनी जीभ से मेरे लंड को लपेटा, चाटा, और अपने गले तक ले जाने की कोशिश की।
“ओह्ह्ह… बहुत अच्छा…,” मैंने कहा, उसके बालों को पकड़ते हुए।
सिमरर ने उस समय अपने कपड़े उतार दिए थे। वो नंगी होकर हमारे पास आई, और स्वाति की पैंटी खींचकर उतार दी।
“देखो… कितनी गीली हो गई है ये…,” सिमरन ने कहा, स्वाति की चूत को अपनी उंगली से सहलाते हुए।
मैंने स्वाति को फर्श पर लिटाया। उसके पैर फैलाए, उसकी चूत देखी – एकदम साफ, गुलाबी, चिकनी। मैंने अपने लंड को उसके मुँह पर रखा और एक जोरदार धक्का लगाया।
“उउउह्ह्ह… आह्ह्ह… हाय्य्य…,” स्वाति चीखी।
वो कुंवारी थी। मेरे लंड को उसकी चूत ने कसकर पकड़ लिया था। मैंने धीरे-धीरे धक्के लगाने शुरू किए, उसकी चीखें कम होती गईं और आहें निकलने लगीं।
“उफ्फ्फ… आह्ह्ह… बहुत मज़ा आ रहा है… और तेज़… प्लीज़…,” स्वाति बोली।
सिमरन ने उसके स्तनों को पकड़ा, दबाया, और मेरे धक्कों को और तेज़ करने के लिए उकसाया। मैंने 20 मिनट तक उसकी चूत मारी, फिर उसकी गांड मारी, और फिर उसके मुंह में अपना माल छोड़ दिया।
वो दोनों एक-दूसरे के होंठों पर एक लंबा, जुनूनी किस शेयर कर रही थीं, जब मैंने उन्हें देखा। रात की खामोशी में, वो दोनों मेरी रखेल बन चुकी थीं।
भाग 4: स्नेहा की बलि – कुंवारी बहन की शर्मिंदगी
कुछ और हफ्ते बीत गए। मैं अब सिमरन और स्वाति दोनों को नियमित चोद रहा था। लेकिन मेरा मन अब एक नई शिकार की तलाश में था – सिमरन की बहन स्नेहा।
स्नेहा, 22 साल की, कॉलेज की छात्रा, एकदम कुंवारी, कभी किसी मर्द के हाथ नहीं लगी। उसकी मासूमियत, उसकी शर्म, और उसकी कुंवारी चूत का ख्याल ही मुझे पागल कर देता था।
मैंने सिमरन से कहा, “मुझे तुम्हारी बहन स्नेहा भी चाहिए।”
सिमरन ने पहले तो मना किया, “नहीं… वो तो कुंवारी है… मेरी बहन है… मैं ऐसा नहीं कर सकती।”
लेकिन मैंने उसे धमकाया, “अगर तुमने मना किया, तो मैं तुम्हारे पति को सब कुछ बता दूंगा। तुम्हारी वो रातें, तुम्हारी ये हरकतें, तुम्हारी ये चुदाई… सब कुछ।”
सिमरन डर गई। उसने हामी भर दी।
अगले दिन, सिमरन ने स्नेहा को मेरे घर बुलाया। एक बहाने से – कि उसे कुछ पैसे देने हैं।
स्नेहा आई। उसने एक सलवार कमीज पहनी थी, हल्का गुलाबी रंग, उसके गोरे चेहरे पर एक मासूमियत, आंखों में एक मासूम सवाल, और शरीर पर एक कसी हुई कमर और उभरी हुई छाती।
“दीदी, ये कौन हैं?” स्नेहा ने पूछा, मुझे देखते हुए।
“ये… ये मेरे दोस्त हैं… मुकेश जी,” सिमरन ने कहा, उसकी आवाज़ कांप रही थी।
रात के 10 बजे थे। हम तीनों टेरेस पर थे। सिमरन ने स्नेहा को एक गिलास जूस दिया जिसमें उसने थोड़ी वाइन मिला रखी थी।
स्नेहा ने वो जूस पिया। धीरे-धीरे वो ढीली पड़ने लगी। उसकी आंखें लाल होने लगीं, उसकी सांसें तेज़ होने लगीं।
“दीदी… मुझे कुछ अजीब सा लग रहा है…,” स्नेहा ने कहा।
सिमरन ने मेरी तरफ देखा। मैंने सिर हिलाया।
“स्नेहा… तुम्हें कुछ दिखाना है…,” सिमरन ने कहा, और उसने अपने कपड़े उतारने शुरू किए।
“दीदी… ये क्या कर रही हो…?,” स्नेहा हैरान होकर बोली, अपनी आंखें झुकाने की कोशिश करते हुए।
“देखो… देखो क्या होता है…,” सिमरन ने कहा, और उसने अपनी सभी कपड़े उतार दिए। वो नंगी खड़ी थी, अपनी बहन के सामने।
मैंने भी अपने कपड़े उतार दिए। मेरा लंड पूरी तरह खड़ा था, 7 इंच लंबा, मोटा, और कसा हुआ।
स्नेहा ने अपने हाथों से अपनी आंखें ढक लीं। “नहीं… प्लीज़… ये सब क्या है…?”
सिमरन ने उसके हाथ खींचे। “देखो… ये है असली मर्द… ये है वो चीज़ जो तुम्हें खुशी दे सकती है…”
मैंने स्नेहा के पास जाकर उसके हाथों को खींचा। उसने अपनी आंखें खोलीं और मेरे नंगे शरीर को देखा। उसकी आंखें मेरे लंड पर टिक गईं। उसने कभी ऐसा नहीं देखा था।
“डरो मत…,” मैंने कहा, उसके चेहरे को अपने हाथों में लेते हुए।
मैंने उसके होंठों पर अपने होंठ रखे। एक हल्का, शर्मीला किस। वो कांप रही थी, उसका शरीर कांप रहा था, लेकिन वो मुझे धकेल नहीं रही थी।
मैंने उसकी कमीज उतारी। अंदर एक सफेद रंग की ब्रा थी। फिर उसकी सलवार उतारी। अंदर एक मैचिंग पैंटी थी।
“क्या खूबसूरत हो तुम,” मैंने कहा, उसके शरीर को देखते हुए।
सिमरन ने आगे बढ़कर उसकी ब्रा खोल दी। उसके स्तन एकदम ताज़े थे, गोल, गुलाबी निपल्स वाले, कसे हुए, कुंवारी लड़की के स्तन।
“नहीं… दीदी… प्लीज़…,” स्नेहा रोने लगी।
“चुप हो जा… तुझे मज़ा आएगा…,” सिमरन ने कहा, और उसने उसकी पैंटी भी खींचकर उतार दी।
स्नेहा नंगी खड़ी थी, अपने हाथों से अपनी चूत और स्तन ढंकने की कोशिश कर रही थी। उसकी चूत पर हल्के-हल्के बाल थे, गुलाबी, चिकनी, एकदम कुंवारी।
मैंने उसके हाथों को खींचा और उसे फर्श पर लिटा दिया। उसके पैर फैलाए, उसकी कुंवारी चूत देखी।
“आज इसकी कुंवारी चूत फाड़ूंगा,” मैंने सिमरन से कहा।
सिमरन ने सिर हिलाया, उसकी आंखों में आंसू थे, लेकिन वो कुछ नहीं बोल सकती थी।
मैंने अपने लंड को स्नेहा की चूत के मुँह पर रखा। वो रो रही थी, “प्लीज़… मत करो… दर्द होगा… मैं कुंवारी हूं…”
“शांत हो जा… बस एक बार दर्द होगा… फिर मज़ा आएगा,” मैंने कहा, और एक जोरदार धक्का लगाया।
“उउउउउह्ह्ह्ह्ह… आह्ह्ह्ह्ह… हाय्य्य्य्य राम्म्म्म… मर गईईई…,” स्नेहा की चीख टेरेस पर गूंजी।
मेरा लंड उसकी कुंवारी चूत को फाड़ता हुआ अंदर चला गया। खून निकला, उसकी चूत से, उसकी कुंवारीपन की निशानी।
स्नेहा रो रही थी, चीख रही थी, उसका शरीर कांप रहा था। लेकिन मैंने रुका नहीं। मैंने धीरे-धीरे धक्के लगाने शुरू किए।
“घप… घप… घप…,” आवाज़ें आ रही थीं।
“आह्ह्ह… उम्म्म… हाय्य्य… दर्द… बहुत दर्द…,” स्नेहा चीख रही थी।
सिमरन ने उसके स्तनों को पकड़ा, उन्हें दबाया, उसे चुप कराने की कोशिश की। “शांत हो जा… शांत हो जा…”
धीरे-धीरे, 10 मिनट की चुदाई के बाद, स्नेहा की चीखें कम होने लगीं। उसकी चूत गीली होने लगी थी, उसका दर्द कामुकता में बदलने लगा था।
“उफ्फ्फ… आह्ह्ह… अब… अब ठीक लग रहा है…,” स्नेहा ने कहा, उसकी आवाज़ अब कामुकता से भरी थी।
मैंने और तेज़ धक्के लगाने शुरू किए। “कैसा लग रहा है? कैसा लग रहा है मेरी रखेल?”
“अह्ह्ह… बहुत अच्छा… उफ्फ्फ… और तेज़… प्लीज़… और तेज़…,” स्नेहा बोली, अब पूरी तरह मस्ती में।
मैंने उसे घोड़ी बनाया, उसकी गांड मारी, उसके मुंह में अपना लंड दिया, और फिर उसकी चूत में फिर से अपना लंड घुसाया।
“उह्ह्ह… आह्ह्ह… ओह्ह्ह… माय्य्य गॉड्ड्ड…,” स्नेहा की आवाज़ें टेरेस पर गूंज रही थीं।
मैंने 30 मिनट तक उसकी चूत मारी, उसकी गांड मारी, उसके मुंह में अपना लंड दिया। फिर, जब मैं झड़ने वाला था, तो मैंने अपना लंड उसकी चूत से बाहर निकाला और उसके मुंह में घुसा दिया।
“चूसो… अपनी कुंवारी चूत का रस चखो…,” मैंने कहा।
उसने अपने मुंह में मेरा लंड लिया और चूसा। कुछ ही पलों में मैंने अपना सारा माल उसके मुंह में छोड़ दिया। वो सब पी गई, एक भी बूंद बर्बाद नहीं होने दी।
वो फर्श पर गिर गई, सांसें फूंकती हुई, उसकी चूत से खून और रस बह रहा था, लेकिन उसके चेहरे पर एक अजीब सी संतुष्टि थी। उसने अपनी दीदी की तरफ देखा, और उन दोनों ने एक-दूसरे के होंठों पर एक लंबा, जुनूनी किस शेयर किया।
रात की खामोशी में, वो तीनों – सिमरन, स्वाति, और स्नेहा – मेरी रखेल बन चुकी थीं। वो रात उनके लिए हमेशा के लिए एक याद बन गई – एक दर्दनाक, शर्मनाक, लेकिन कामुक याद।
भाग 5: त्रिगुट चुदाई – तीनों की एक साथ बलि
अगली रात, मैंने तीनों को एक साथ बुलाया। टेरेस पर, रात की खामोशी में, हम चारों अकेले थे।
सिमरन, स्वाति, और स्नेहा – तीनों नंगी खड़ी थीं। तीनों की चूतें गीली थीं, तीनों के स्तन उभरे हुए थे, तीनों की आंखों में एक कामुक लालसा थी।
“आज मैं तीनों को एक साथ चोदूंगा,” मैंने कहा, अपने लंड को हिलाते हुए।
मैंने सबसे पहले सिमरन को लिटाया, उसकी चूत में अपना लंड घुसाया, और धक्के लगाने शुरू किए। “घप… घप… घप…”
“आह्ह्ह… उम्म्म… हाय्य्य…,” सिमरन चीख रही थी।
फिर मैंने स्वाति को बुलाया, उसे घोड़ी बनाया, और उसकी गांड में अपना लंड घुसा दिया। “घप… घप… घप…”
“उह्ह्ह… आह्ह्ह… ओह्ह्ह…,” स्वाति चीख रही थी।
फिर मैंने स्नेहा को बुलाया, उसके मुंह में अपना लंड दिया, और उसे चूसने को कहा। “चूसो… अच्छे से चूसो…”
“उम्म्म… चुप… चुप…,” स्नेहा चूस रही थी।
मैंने तीनों को बारी-बारी से चोदा – सिमरन की चूत, स्वाति की गांड, स्नेहा का मुंह। फिर स्वाति की चूत, स्नेहा की गांड, सिमरन का मुंह। फिर स्नेहा की चूत, सिमरन की गांड, स्वाति का मुंह।
“आह्ह्ह… उम्म्म… हाय्य्य… उफ्फ्फ… ओह्ह्ह… माय्य्य गॉड्ड्ड…,” तीनों की आवाज़ें मिलकर एक सिम्फनी बन रही थीं।
मैंने तीनों को एक-दूसरे को चूमने को कहा। सिमरन ने स्वाति के होंठों पर अपने होंठ रखे, एक लंबा, जुनूनी किस। फिर स्वाति ने स्नेहा को किस किया। फिर स्नेहा ने सिमरन को किस किया। तीनों एक-दूसरे के स्तनों को दबा रही थीं, एक-दूसरे की चूतों को चाट रही थीं, एक-दूसरे को मदहोश कर रही थीं।
मैंने उन तीनों को घोड़ी बनाया – एक लाइन में, तीनों की गांडें ऊपर, तीनों की चूतें नीचे। मैंने एक-एक करके तीनों की गांड मारी, तीनों की चूत मारी, और फिर तीनों के मुंह में एक-एक करके अपना माल छोड़ा।
“उह्ह्ह… आह्ह्ह… ओह्ह्ह…,” तीनों एक साथ चीख रही थीं।
वो रात खत्म हुई जब सुबह के 4 बजे थे। तीनों थकी हुई, पसीने से लथपथ, लेकिन संतुष्ट, फर्श पर पड़ी थीं। उनके शरीरों पर मेरे माल के निशान थे, उनकी चूतें और गांडें लाल थीं, उनके मुंह में मेरे लंड का स्वाद था।
मैंने उन तीनों को देखा, और मुस्कुराया। “आज से तुम तीनों मेरी रखेल हो। जब भी मैं चाहूं, तुम मुझे दोगी। समझीं?”
तीनों ने धीरे से सिर हिलाया। उनकी आंखों में एक गुलामी की मुहर थी, लेकिन साथ ही एक कामुक संतुष्टि भी।
रात की खामोशी में, वो तीनों एक-दूसरे के होंठों पर एक लंबा, जुनूनी किस शेयर कर रही थीं। वो रात उनके लिए हमेशा के लिए एक याद बन गई – एक दर्दनाक, शर्मनाक, लेकिन कामुक याद जो उन्हें हमेशा मेरी गुलामी में रखेगी।
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